भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास और उसका सामाजिक प्रभाव चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

Authors

  • लईक अहमद शोध छात्र, श्री कृष्णा विश्वविद्यालय, छत्तरपुर, मध्यप्रदेश। Author
  • डॉ. जयसिंह राठौर एसोसिएट प्रोफेसर, श्री कृष्णा विश्वविद्यालय, छत्तरपुर, मध्यप्रदेश। Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i2.07

Keywords:

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामाजिक प्रभाव, डिजिटल परिवर्तन, रोजगार संरचना, डेटा गोपनीयता, नैतिक शासन।

Abstract

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधुनिक तकनीकी प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसने वैश्विक स्तर पर सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत ढांचों को प्रभावित किया है। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास डिजिटल परिवर्तन की प्रक्रिया को गति प्रदान कर रहा है, जिसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, न्याय प्रणाली, प्रशासन और श्रम बाजार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। इस सन्दर्भ में, AI न केवल कार्यकुशलता और उत्पादकता को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि इससे सामाजिक सम्बन्धों और मानव व्यवहार के स्वरूप को भी पुनर्परिभाषित किया है। इस शोध का उद्देश्य भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास की प्रवृत्तियों और उसके सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन विशेष रूप से रोजगार संरचना में बदलाव, सामाजिक असमानता, डिजिटल विभाजन, डेटा गोपनीयता और नैतिक जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। शोध यह स्पष्ट करता है कि जहाँ AI तकनीकी सामाजिक सेवाओं की गुणवत्ता और पहुँच में सुधार कर सकती है, इसके अनियंत्रित और असमान उपयोग से सामाजिक विषमता और मानव अधिकारों से जुड़े नए चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यह अध्ययन द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है जिसमें सरकारी नीतिगत दस्तावेजों, नीति आयोग की रिपोर्टों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रकाशनों और समकालीन शोध लेखों का विश्लेषण किया गया है। शोध निष्कर्षतः यह दर्शाता है कि भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास एक समावेशी, नैतिक और मानव केंद्रित नीति ढांचे के तहत होना आवश्यक है ताकि तकनीकी प्रगति सामाजिक न्याय और सतत विकास के लक्ष्यों के अनुरूप हो सके।

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Published

2026-05-20

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Articles

How to Cite

भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास और उसका सामाजिक प्रभाव चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ. (2026). International Journal of Educational Analysis and Global Research (IJEAGR), 1(02), 50-55. https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i2.07