जनजातीय क्षेत्रों में विकास और महिला जागरूकता

Authors

  • डॉ. मनोज कुमार गौतम एसोसिएट प्रोफेसर,समाजशास्त्र विभाग, राजकीय महाविद्यालय, बरकी, सेवापुरी, वाराणसी Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i3.02

Keywords:

जनजातीय विकास, महिला जागरूकता, महिला सशक्तीकरण, ग्रामसभा, वन अधिकार, आजीविका, सामाजिक सहभागिता।

Abstract

भारत के जनजातीय क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों, सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक जीवन-पद्धतियों से समृद्ध हैं। इसके बावजूद भौगोलिक दुर्गमता, आधारभूत सुविधाओं की कमी, विस्थापन, वन एवं भूमि अधिकारों से संबंधित विवाद, कमजोर बाजार पहुँच और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता ने इन क्षेत्रों के विकास को प्रभावित किया है। इन परिस्थितियों का प्रभाव जनजातीय महिलाओं पर अधिक जटिल रूप में पड़ता है, क्योंकि वे उत्पादन, कृषि, वनोपज-संग्रह, परिवार-देखभाल और सांस्कृतिक संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद संसाधनों, निर्णय-निर्माण और औपचारिक संस्थाओं तक समान पहुँच नहीं प्राप्त कर पातीं। प्रस्तुत शोध-लेख जनजातीय क्षेत्रों के विकास और महिला जागरूकता के पारस्परिक संबंध का अध्ययन करता है। यह गुणात्मक, वर्णनात्मक और दस्तावेज-आधारित अध्ययन है, जिसमें जनगणना, जनजातीय कार्य मंत्रालय की रिपोर्टों, पंचायती राज व्यवस्था, वन अधिकार अधिनियम, सरकारी आजीविका कार्यक्रमों और महिला स्वयं सहायता समूहों से संबंधित आधिकारिक सामग्री का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में महिला जागरूकता को केवल साक्षरता तक सीमित न मानकर स्वास्थ्य, पोषण, कानूनी अधिकार, वित्तीय समावेशन, डिजिटल क्षमता, राजनीतिक भागीदारी और प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक अधिकारों की समझ से जोड़ा गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि जनजातीय महिलाओं को केवल योजनाओं की लाभार्थी बनाने से स्थायी सशक्तीकरण संभव नहीं होगा। विकास-योजनाओं की पहचान, नियोजन, क्रियान्वयन और सामाजिक लेखा-परीक्षा में उनकी सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। मातृभाषा-आधारित शिक्षा, स्थानीय महिला नेतृत्व, सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएँ, वनाधारित आजीविका, वित्तीय एवं डिजिटल साक्षरता तथा ग्रामसभा-केंद्रित प्रशासन जनजातीय क्षेत्रों के न्यायपूर्ण विकास की आधारशिला बन सकते हैं।

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Published

2026-08-04

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How to Cite

जनजातीय क्षेत्रों में विकास और महिला जागरूकता. (2026). International Journal of Educational Analysis and Global Research (IJEAGR), 1(3), 15-21. https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i3.02