सिनेमा और दृश्य माध्यमों में स्मृति का आख्यान
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https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i2.04##semicolon##
सिनेमा, स्मृति, दृश्य माध्यम, आख्यान, थिएटर, डिजिटल मीडिया, एपिजेनेटिक, संस्कृति, लोकतंत्रीकरण, नास्टेल्जिया।सार
स्मृति का आख्यान मात्र बीती हुई घटनाओं को स्मरण करने का साधन नहीं है अपितु यह हमारे अस्तित्व, पहचान और मानवीय सम्वेदनाओं का जीवंत दस्तावेज है। यह बीते हुए कल का एक ऐसा रंगमंच है जिसके माध्यम से हम आज को समझते हैं और कल की तैयारी करते हैं। जब कोई व्यक्ति या लेखक अपनी पुरानी यादों को एक सुनियोजित कहानी का रूप देता है तो उसे स्मृति का आख्यान कहा जाता है। सिनेमा, दृश्य कलाओं के विभिन्न रूप एवं साहित्य की अनेक विधाएँ स्मृति के आख्यान पर टिकी हैं। स्मृति के आख्यान में सिनेमा और थिएटर सबसे सक्षम और समय को रोकने तथा उसे वर्तमान में लाने के सशक्त माध्यम हैं । फ्लैशबैक में जब कोई किरदार अतीत में जाता है तो दर्शक भी उसके साथ बीती हुई याद का हिस्सा बन जाते हैं। दृश्य माध्यम के जितने भी प्रकार हैं, वे सब कला के व्यापक क्षेत्र हैं। हस्तकला, चित्रकला, मूर्तिकला, डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया मंच, ग्राफिक डिजाइन, डिजिटल आर्ट, फोटोग्राफी आदि मनुष्य के अतीत की भावनाओं, अनुभवों को दर्शाने वाले दृश्य माध्यम हैं। इन सब में सिनेमा और थिएटर इतिहास की आख्या करने वाले दो मजबूत मंच हैं। कला के सभी दृश्य माध्यमों अथवा कलात्मक गतिविधियों में हमारी सक्रिय भागीदारी और दिलचस्पी हमारे जीवन को अधिक स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल और ऊर्जावान बनाकर उसे सामाजिक नवनिर्माण की ओर प्रेरित करती है। इतना ही नहीं, जो लोग नियमित रूप से थिएटर जाते हैं या संगीत, पेंटिंग सीखते हैं उनकी एपिजेनेटिक आयु उन लोगों की तुलना में काफी कम होती है जो कला से दूर रहते हैं। निश्चित ही यह चौंकाने वाला तथ्य है।
