रामानंदीय शिष्य- परंपरा में राम- भक्ति

लेखक

  • डॉ. प्रद्युम्न सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, हण्डिया पी जी कॉलेज हण्डिया प्रयागराज -221503 ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i3.08

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रामानंद, रामानंदीय शिष्य-परंपरा, राम-भक्ति, भक्ति आंदोलन, संत परंपरा, कबीर, संत रविदास, गुरु नानक, दादू दयाल, निर्गुण भक्ति, निर्गुण ब्रह्म, राम-नाम, सद्गुरु, सामाजिक समरसता, धार्मिक समन्वय, एकेश्वरवाद, लोकमंगल, आत्मानुभूति, हिंदी संत साहित्य, मध्यकालीन हिंदी साहित्य।

सार

शोध -लेख में रामानंदीय शिष्य-परंपरा के आलोक में राम-भक्ति की वैचारिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक परंपरा का समग्र अध्ययन किया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि स्वामी रामानंद ने राम-भक्ति को संकीर्ण धार्मिक सीमाओं से मुक्त कर उसे लोककल्याण, सामाजिक समता और मानवीय एकता का आधार बनाया। उनके शिष्यों एवं परवर्ती संतों—विशेषतः कबीर, संत रविदास, गुरु नानक तथा दादू दयाल—ने गुरु-परंपरा से प्राप्त राम-भक्ति को निर्गुण ब्रह्म, आत्मानुभूति, प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता के व्यापक संदर्भ में विकसित किया। इस अध्ययन में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि इन संतों के लिए 'राम' किसी ऐतिहासिक या सांप्रदायिक सीमा में बँधा नाम नहीं, बल्कि सर्वव्यापक, निराकार एवं सार्वभौमिक परमसत्ता का प्रतीक है। उन्होंने बाह्य आडंबर, जाति-भेद, कर्मकांड और धार्मिक संकीर्णता का विरोध करते हुए अंतःकरण की पवित्रता, सद्गुरु की महत्ता तथा निष्काम भक्ति को मुक्ति का वास्तविक मार्ग माना। शोध का निष्कर्ष यह है कि रामानंदीय शिष्य-परंपरा ने भारतीय भक्ति आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान किया तथा हिंदी संत साहित्य को ऐसी मानवीय और समन्वयवादी दृष्टि दी, जो आज भी सामाजिक सौहार्द, समानता और आध्यात्मिक चेतना के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

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प्रकाशित

2026-08-08

अंक

खंड

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