किशोरों के मनो-शारीरिक स्वास्थ्य पर नियमित व्यायाम का दीर्घकालिक प्रभाव: एक शोध-समीक्षा

लेखक

  • डॉ. बृजेश कुमार यादव एसोसिएट प्रोफेसर, शारीरिक शिक्षा विभाग नागरिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय जंघई, जौनपुर उ. प्र. ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.64880/ijeagr.v1i2.21

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किशोरावस्था, नियमित व्यायाम, शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य, अवसाद, संज्ञानात्मक विकास, जीवनशैली

सार

किशोरावस्था मानव विकास का एक अत्यंत संवेदनशील एवं परिवर्तनशील चरण है, जिसमें शारीरिक वृद्धि के साथ-साथ संज्ञानात्मक, संवेगात्मक और सामाजिक विकास भी तीव्र गति से होता है। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ते स्क्रीन-टाइम, शैक्षिक दबाव, अपर्याप्त नींद तथा शारीरिक निष्क्रियता ने किशोरों के मनो-शारीरिक स्वास्थ्य के समक्ष नई चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं। प्रस्तुत शोध-समीक्षा का उद्देश्य उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य के आधार पर यह विश्लेषण करना है कि नियमित शारीरिक व्यायाम किशोरों के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, संज्ञानात्मक क्षमताओं, नींद, आत्म-सम्मान तथा भविष्य के स्वास्थ्य पर किस प्रकार दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा प्रकाशित अनुदैर्ध्य अध्ययनों, systematic reviews और meta-analyses के निष्कर्षों का विश्लेषण दर्शाता है कि नियमित शारीरिक गतिविधि बेहतर हृदय-श्वसन क्षमता, मांसपेशीय स्वास्थ्य, अस्थि स्वास्थ्य, शरीर-संरचना और cardiometabolic health से संबद्ध है। मानसिक स्तर पर इसके संबंध कम अवसादी लक्षणों, बेहतर मनोदशा, मनोवैज्ञानिक कल्याण और कुछ बेहतर संज्ञानात्मक परिणामों से पाए गए हैं। 2026 में प्रकाशित 44 longitudinal studies की systematic review में किशोरावस्था की शारीरिक सक्रियता का प्रारम्भिक वयस्कता के अनेक स्वास्थ्य परिणामों से अनुकूल संबंध पाया गया। तथापि, अधिकांश दीर्घकालिक प्रमाण observational हैं; इसलिए प्रत्येक संबंध को प्रत्यक्ष कारण-परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। समीक्षा से निष्कर्ष निकलता है कि विद्यालय, परिवार और समुदाय द्वारा किशोरों को नियमित, सुरक्षित और आनंददायक शारीरिक गतिविधि के पर्याप्त अवसर देना वर्तमान स्वास्थ्य के साथ भविष्य के स्वस्थ जीवन की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

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प्रकाशित

2026-05-20

अंक

खंड

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